Bilaspur

BILASPUR : तो क्या हुआ पत्नी की ज्यादा है कमाई, मुकदमा का खर्च उठाएगा पति

बिलासपुर। मुकदमा का खर्च उठाएगा पति, सुनने में बात थोड़ी अजीब लगती है, लेकिन यह हकीकत भी है और कोर्ट का आदेश भी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च (Litigation Expenses) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी कमाई पति से ज्यादा है, तब भी वह अदालती कार्यवाही में शामिल होने के लिए आवश्यक यात्रा, भोजन और मुकदमा का खर्च पति से पाने की हकदार है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ (Division Bench) ने इस मामले में सूरजपुर कुटुंब न्यायालय (Family Court) के आदेश को सही ठहराते हुए पति की अपील को खारिज कर दिया। कुल मिलाकर हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब पति को ना चाहते हुए भी, मुकदमा का खर्च वहन करना ही पड़ेगा। जबकि कोर्ट में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पत्नी की कमाई पति से तीन गुना ज्यादा है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति आशीष राय ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक (Divorce) की याचिका दायर की थी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी अंजलि राय ने ‘हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24’ (Section 24 of Hindu Marriage Act) के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।

पति का तर्क: पत्नी की आय मुझसे तीन गुना ज्यादा

पति आशीष राय ने निचली अदालत में सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त पत्नी की सैलरी स्लिप पेश की। पति की ओर से दलील दी गई कि उसकी पत्नी एक सरकारी शिक्षिका है और उसे हर महीने 71,482 रुपये वेतन मिलता है। वहीं, वह खुद एक संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी (Contractual Ayush Medical Officer) है और उसकी मासिक आय केवल 25,700 रुपये के आसपास है। पति का तर्क था कि चूंकि पत्नी की आय उससे लगभग तीन गुना अधिक है और वह आत्मनिर्भर है, इसलिए वह किसी भी वित्तीय सहायता की पात्र नहीं है।

कुटुंब न्यायालय ने क्या दिया था आदेश?

सूरजपुर कुटुंब न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए माना था कि पत्नी स्वयं का भरण-पोषण (Maintenance) करने में पूरी तरह सक्षम है, इसलिए उसे मासिक गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि मुकदमे की पैरवी के लिए पत्नी को खर्च मिलना चाहिए। कुटुंब न्यायालय ने पति को आदेश दिया था कि वह पत्नी को:

  • मुकदमे की पैरवी के लिए 3,000 रुपये एकमुश्त (अदालती खर्च) दे।
  • अदालत में पेशी की प्रत्येक तारीख के लिए यात्रा और भोजन व्यय के रूप में 1,000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान करे।
  • पति ने कुटुंब न्यायालय के इसी आदेश को बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट की टिप्पणी: ‘यह जीवन-यापन के लिए नहीं, निष्पक्ष सुनवाई के लिए है’

जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभू दत्त गुरु की डिवीजन बेंच ने पति की आपत्तियों और अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कानून की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“वैवाहिक मुकदमों में पक्षकारों को बार-बार अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे यात्रा, भोजन और अन्य व्यावहारिक खर्च होना स्वाभाविक है। यह राशि पत्नी को जीवन-यापन (Sustenance) के लिए नहीं दी जा रही है, बल्कि अदालत की कार्यवाही में उसकी प्रभावी और निष्पक्ष भागीदारी (Effective Participation) सुनिश्चित करने के लिए दी जा रही है।”

अपील खारिज, निचली अदालत का फैसला बरकरार

उच्च न्यायालय ने कहा कि कुटुंब न्यायालय द्वारा तय की गई राशि (1,000 रुपये प्रतिमाह और 3,000 रुपये एकमुश्त) बेहद व्यावहारिक है और यह कोई अत्यधिक या असंगत राशि नहीं है। इस आदेश से पति पर कोई गंभीर आर्थिक बोझ पड़ने का कोई प्रमाण भी सामने नहीं आया है।

हाई कोर्ट की बेंच ने सूरजपुर कोर्ट के आदेश को न्यायसंगत, विवेकपूर्ण और कानून के दायरे में मानते हुए पति आशीष राय की याचिका को निराधार पाकर खारिज कर दिया।

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