पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, पंडवानी गायन की महान हस्ती ने 70 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

छत्तीसगढ़ की लोक कला और पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने शनिवार तड़के रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स रायपुर के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) ने की है।
जानकारी के मुताबिक, तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से एम्स रायपुर में भर्ती थीं और उनकी तबीयत लगातार नाजुक बनी हुई थी। शनिवार तड़के करीब 3:15 बजे उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उनका निधन हो गया। उनके जाने से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोककला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में विशिष्ट पहचान दिलाई। उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।”
रूढ़ियों को तोड़कर बनाई अपनी अलग पहचान
वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साहस और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायक मिसाल रहा। उन्होंने महाभारत की पारंपरिक लोकगायन शैली पंडवानी को न केवल नई पहचान दिलाई, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
उन्होंने उस दौर में पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ को अपनाया, जब इस शैली पर पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था। शुरुआती दिनों में उन्हें सामाजिक विरोध और कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी बुलंद आवाज, प्रभावशाली अभिनय और हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उनकी प्रस्तुति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
दुनिया भर में बिखेरी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की चमक
पांच दशकों से अधिक लंबे अपने शानदार करियर में तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ एशिया, यूरोप और दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी। उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए इस विलुप्त होती लोक परंपरा को नई ऊर्जा दी और कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया। उनकी बदौलत छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुईं सम्मानित
लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री (1988), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए।
डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोककला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी कला, आवाज और विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

