BSP में 114 करोड़ की लोहा चोरी का खुलासा, फ्ल्यू डस्ट की आड़ में चलता था संगठित सिंडिकेट

भिलाई स्टील प्लांट (BSP) में करोड़ों रुपये के लोहा चोरी मामले की जांच में बड़े संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में कथित मास्टरमाइंड संजय सिंह समेत बीएसपी के कुछ अधिकारियों, ट्रांसपोर्टरों, ड्राइवरों, क्रेन ऑपरेटरों और स्क्रैप कारोबारियों सहित अब तक 15 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्लांट के भीतर और बाहर सक्रिय एक संगठित सिंडिकेट का काम था।
जांच के मुताबिक, स्टील निर्माण के दौरान निकलने वाले फ्ल्यू डस्ट की आड़ में कीमती लोहे की प्लेटें और कटिंग ट्रकों में छिपाकर प्लांट से बाहर भेजी जाती थीं। ट्रकों में पहले फ्ल्यू डस्ट भरी जाती, फिर उसके नीचे लोहा रखा जाता और ऊपर से दोबारा डस्ट डाल दी जाती थी, जिससे सुरक्षा जांच के दौरान चोरी का माल दिखाई नहीं देता था।
पुलिस के अनुसार, चोरी के लिए पहले से तय ट्रकों और ड्राइवरों का इस्तेमाल किया जाता था। ट्रकों की एंट्री वे-ब्रिज पर दर्ज होने के बाद उनमें GPS लगाया जाता था, लेकिन लोडिंग के बाद कथित तौर पर GPS और नंबर प्लेट बदल दिए जाते थे। इसके बाद ट्रकों को तय स्थानों पर ले जाकर उनमें कीमती लोहा लोड किया जाता और फिर फ्ल्यू डस्ट से ढंककर प्लांट से बाहर निकाला जाता था।
जांच में यह भी सामने आया है कि चोरी के नेटवर्क में दो अलग-अलग ड्राइवर और कुछ निजी ऑपरेटर शामिल थे, जो ट्रकों की आवाजाही, लोडिंग और पूरे ऑपरेशन की निगरानी करते थे। पुलिस का दावा है कि सुरक्षा व्यवस्था को भ्रमित करने के लिए एक जैसे रंग के ट्रकों का उपयोग किया जाता था और कई मामलों में पुराने वाहनों की नंबर प्लेट भी लगाई जाती थी। कुछ ट्रकों में गुप्त चेंबर बनाए जाने की भी जानकारी मिली है।
पुलिस के अनुसार, प्लांट से बाहर निकलने के बाद चोरी का लोहा पहले एक गोदाम में पहुंचाया जाता था, जहां उसकी छंटाई कर अलग-अलग खरीदारों तक भेजने की तैयारी होती थी। इसके बाद कथित तौर पर फर्जी बिलों के जरिए माल को वैध दिखाकर रायपुर समेत अन्य शहरों की रोलिंग मिलों में सप्लाई किया जाता था।
जांच एजेंसियों का अनुमान है कि जनवरी से जून 2026 के बीच सप्ताह में चार दिन और प्रतिदिन करीब 200 टन लोहा प्लांट से बाहर निकाला गया। इस आधार पर छह महीने में लगभग 20,800 टन लोहा चोरी होने और इसकी बाजार कीमत करीब 104 से 114 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है।
पुलिस का दावा है कि कथित मास्टरमाइंड संजय सिंह कॉन्ट्रैक्ट लेबर के पहचान पत्र का इस्तेमाल कर नियमित रूप से प्लांट में प्रवेश करता था और अंदर से पूरे नेटवर्क का संचालन करता था। जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि उसे प्लांट के भीतर कथित तौर पर कार्यालय संचालित करने की सुविधा किसकी मदद से मिली।
इस मामले के सामने आने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। जांच में यह तथ्य सामने आया है कि जिन स्थानों पर चोरी की आशंका थी, वहां पर्याप्त CCTV कैमरे नहीं लगे थे। वहीं, फ्ल्यू डस्ट से भरे ट्रकों की सुरक्षा जांच के बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में लोहा बाहर निकलने पर CISF की निगरानी और जांच प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है।
वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने मामले की CBI जांच की मांग करते हुए दावा किया है कि प्लांट में केवल लोहा ही नहीं, बल्कि कॉपर, पीतल और इलेक्ट्रिकल उपकरणों की चोरी करने वाले कई अन्य सिंडिकेट भी सक्रिय हैं। उन्होंने ट्रांसपोर्ट व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की मांग की है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
फिलहाल पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क, कथित मिलीभगत, सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक और आर्थिक नुकसान के सभी पहलुओं की विस्तृत जांच कर रही हैं। मामले में आगे और गिरफ्तारियां होने की संभावना भी जताई जा रही है।

