सैटेलाइट से सुपर कंप्यूटर तक: जानिए मौसम विभाग कैसे लगाता है बारिश का सटीक पूर्वानुमान

देशभर में मानसून की गतिविधियों और बदलते मौसम के बीच लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल रहता है कि बारिश कब होगी और किस क्षेत्र में मौसम का क्या हाल रहेगा। इन सवालों का जवाब देने के लिए मौसम विभाग अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का सहारा लेता है। सैटेलाइट, डॉप्लर वेदर रडार, मौसम गुब्बारे, सुपर कंप्यूटर और विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की 24 घंटे निगरानी के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान तैयार किया जाता है।
इस वर्ष अल-नीनो के प्रभाव के कारण देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई गई है। छत्तीसगढ़ में भी इसका असर दिखाई दे रहा है। प्रदेश में अब तक 398.2 मिमी वर्षा दर्ज की गई है, जबकि इस अवधि का सामान्य औसत 483 मिमी है। यानी अब भी करीब 18 प्रतिशत बारिश की कमी बनी हुई है।
मौसम विभाग लगातार यह आकलन करता है कि किस जिले में भारी बारिश हो सकती है, अगले कुछ घंटों में आंधी, बिजली गिरने या तेज बारिश की संभावना कितनी है। इसके लिए देशभर में स्थापित मौसम निगरानी केंद्रों से मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। मौसम गुब्बारों के जरिए वातावरण की विभिन्न परतों का तापमान, नमी और हवा की दिशा की जानकारी जुटाई जाती है, जबकि सैटेलाइट बादलों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं।
डॉप्लर वेदर रडार बारिश वाले बादलों की स्थिति, उनकी तीव्रता और दिशा का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन सभी जानकारियों को सुपर कंप्यूटर में प्रोसेस किया जाता है, जहां वैज्ञानिक मॉडल के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान तैयार किया जाता है।
तैयार पूर्वानुमान को मौसम विभाग विभिन्न माध्यमों से राज्य सरकारों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और आम लोगों तक पहुंचाता है, ताकि समय रहते आवश्यक सतर्कता बरती जा सके और मौसम से जुड़ी संभावित आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।

