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भारत में शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल, 1 लाख से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक; 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद

देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़ों ने सरकारी स्कूलों की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा मंत्रालय की ओर से राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2025-26 में देशभर में 1,00,843 ऐसे स्कूल हैं, जहां पूरे स्कूल की जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक के कंधों पर है। दूसरी ओर, नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए हैं और सरकारी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई है।

एक शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल

सिंगल टीचर स्कूल वे स्कूल होते हैं, जहां सभी कक्षाओं को पढ़ाने और स्कूल की अन्य जिम्मेदारियां संभालने के लिए केवल एक शिक्षक मौजूद होता है। ऐसे शिक्षक को पढ़ाई के साथ बच्चों की उपस्थिति, मिड-डे मील की निगरानी, प्रशासनिक काम और सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्य भी संभालने पड़ते हैं। शिक्षक के अवकाश या किसी अन्य सरकारी कार्य में जाने की स्थिति में स्कूल की पढ़ाई और ज्यादा प्रभावित हो सकती है।

UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 16,357 सिंगल टीचर स्कूल हैं। इसके बाद झारखंड में 9,827, महाराष्ट्र में 9,269, कर्नाटक में 8,042 और उत्तर प्रदेश में 7,874 ऐसे स्कूल हैं। राजस्थान में 7,200 और पश्चिम बंगाल में 6,769 सिंगल टीचर स्कूल दर्ज किए गए हैं।

स्कूलों की संख्या घटी, कई राज्यों में बड़ी चुनौती

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई है। इस दौरान सरकारी स्कूलों में नामांकन भी 2.26 करोड़ कम हुआ है। इसके विपरीत निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

सिंगल टीचर स्कूलों की समस्या के पीछे शिक्षकों का सेवानिवृत्त होना, इस्तीफा देना, नए पदों का समय पर सृजन नहीं होना, भर्ती प्रक्रिया में देरी और छात्रों की संख्या के हिसाब से शिक्षकों की तैनाती नहीं होना जैसी वजहें बताई गई हैं। दूरदराज, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

एक शिक्षक पर कई कक्षाओं की जिम्मेदारी होने से मल्टीग्रेड कक्षाओं में बच्चों को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। प्रशासनिक कामों का अतिरिक्त बोझ भी शिक्षकों के पढ़ाने के समय को प्रभावित करता है और उनके कार्यभार व मानसिक दबाव में बढ़ोतरी होती है।

सरकार ने उठाए कदम, फिर भी जमीनी चुनौती बरकरार

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को खाली शिक्षक पद भरने के लिए समय-समय पर सलाह देती है। शिक्षक भर्ती में पारदर्शिता और मेरिट आधारित प्रक्रिया पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा शिक्षक जरूरत का तकनीक आधारित आकलन, भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा और समग्र शिक्षा योजना के तहत वित्तीय सहायता जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सामान्य क्षेत्रों में 30:1 और सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित क्षेत्रों में 25:1 छात्र-शिक्षक अनुपात का लक्ष्य रखा गया है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात 19:1, उच्च प्राथमिक में 17:1, माध्यमिक में 15:1 और उच्च माध्यमिक में 23:1 है।

हालांकि राष्ट्रीय औसत छात्र-शिक्षक अनुपात निर्धारित मानकों के भीतर दिखाई देता है, लेकिन एक लाख से अधिक सिंगल टीचर स्कूल यह संकेत देते हैं कि कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर शिक्षक उपलब्धता की समस्या अभी भी गंभीर है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय पर भर्ती, जरूरत के अनुसार शिक्षकों की तैनाती, दूरदराज क्षेत्रों में नियुक्ति को प्रोत्साहन और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार जरूरी माना जा रहा है।

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