
नई दिल्ली: हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समाचार वेबसाइट ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट ने देश के आर्थिक गलियारों में हलचल मचा दी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कथित तौर पर लगभग 12 अरब डॉलर का सोना बेचा है। इस ख़बर के सामने आते ही देश में आर्थिक स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे। हालांकि, सरकार और रिजर्व बैंक ने तुरंत सामने आकर इन दावों का खंडन किया है।
सरकार और RBI का रुख: ख़बर पूरी तरह भ्रामक
ख़बर के वायरल होने के कुछ ही घंटों के भीतर प्रेस इंफर्मेशन ब्यूरो (PIB) के फैक्ट चेक विंग ने इसे पूरी तरह ‘फ़र्ज़ी और भ्रामक’ करार दिया। इसके तुरंत बाद रिजर्व बैंक (RBI) ने भी सफ़ाई जारी करते हुए कहा कि उसने कोई सोना नहीं बेचा है। RBI के मुताबिक, उसके पास मौजूद सोने की कुल मात्रा (लगभग 880 टन) उतनी ही बनी हुई है जितनी पहले थी। रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़ों में सोने की वैल्यू में जो गिरावट दर्ज की गई थी, वह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की कीमतों और डॉलर में होने वाले उतार-चढ़ाव (Valuation loss) के कारण थी, न कि सोना बेचने की वजह से।
विशेषज्ञों की चिंता: पारदर्शिता और डेटा पर उठते सवाल
तथ्यों की गहराई में जाते हुए आर्थिक मामलों के जानकारों ने कुछ ऐसे बिंदुओं की ओर इशारा किया है जो पूरी तरह इस मामले पर से संशय नहीं हटाते।
46,000 करोड़ रुपये की गिरावट का रहस्य: जानकारों के अनुसार, RBI के साप्ताहिक सप्लीमेंट डेटा के मुताबिक 15 मई से 22 मई के बीच सोने की कुल वैल्यू में लगभग 46,000 करोड़ रुपये की कमी आई थी। अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि उस विशेष सप्ताह में न तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दाम इतने गिरे थे और न ही डॉलर में ऐसा कोई बड़ा बदलाव हुआ था जो इस भारी गिरावट को पूरी तरह सही ठहरा सके। इस विशिष्ट आंकड़े पर फिलहाल RBI का कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं आया है, जिससे बाज़ार में धुंधलापन बना हुआ है।
पारदर्शिता का अभाव: विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक संकट के इस दौर में रुपये को संभालने के लिए सरकार या RBI अमेरिकी डॉलर बॉन्ड बेच रही है या सोना, इस पर पूरी तरह पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि यह देश के नागरिकों का संप्रभु अधिकार (Sovereign Right) है।
देश को क्या नुकसान हो सकता है?
इस पूरे मामले के पीछे छिपे व्यापक आर्थिक संकेतों को देखें, तो भारत के सामने आने वाले समय में कुछ संभावित चुनौतियां आ सकती हैं:
1. कच्चे तेल की कीमतों में भयंकर उछाल की आशंका:
ईरान और अमेरिका/पश्चिम के बीच चल रहा भू-राजनीतिक तनाव जून के महीने में एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। दुनिया के पास मौजूद पेट्रोलियम रिजर्व अब रॉक-बॉटम (न्यूनतम स्तर) पर आ चुके हैं। विशेषज्ञों का अंदेशा है कि यदि अगले 15-20 दिनों में यह तनाव कम नहीं हुआ, तो कच्चे तेल की कीमतें अचानक बढ़कर 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। चूंकि भारत अपनी तेल ज़रूरतों का लगभग 88% हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से देश में महंगाई की एक नई ‘आर्थिक सुनामी’ आ सकती है।
2. रुपये की गिरती साख और अमेरिकी दबाव:
साल के दौरान एशियाई मुद्राओं में भारतीय रुपया काफी दबाव में रहा है। रुपये को और ज़्यादा लुढ़कने (जैसे 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंचने) से रोकने के लिए RBI को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। चर्चा यह भी है कि अमेरिका अपने ट्रेजरी बॉन्ड्स की साख बचाने के लिए विकासशील देशों पर दबाव बना रहा है कि वे अमेरिकी डॉलर बॉन्ड्स न बेचें। ऐसी स्थिति में भारत जैसे देशों के पास अपनी करेंसी को सहारा देने के लिए अन्य रिज़र्व्स पर निर्भर होने की नौबत आ सकती है, जो दीर्घकालिक रूप से आर्थिक संप्रभुता के लिए चिंता का विषय है।
3. विदेशी निवेशकों का घटता भरोसा:
यदि किसी भी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा सोना बेचने या रिज़र्व्स में रहस्यमयी गिरावट की अफ़वाहें लगातार उड़ती हैं और उस पर पूरी पारदर्शिता नहीं बरती जाती, तो इससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) का भरोसा डगमगा सकता है। इससे देश से पूंजी बाहर जाने (Capital Outflow) का ख़तरा बढ़ जाता है।
क्या भारत को कोई फायदा भी मिल सकता है?
सकारात्मक पहलू की बात करें तो भारत की बुनियादी आर्थिक स्थिति में कुछ सुरक्षा कवच (Shock Absorbers) भी मौजूद हैं:
मजबूत गोल्ड रिजर्व: पिछले कुछ वर्षों में (विशेषकर यूक्रेन युद्ध के बाद जब अमेरिका ने रूस के एसेट्स फ्रीज किए थे) भारत सहित दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने भारी मात्रा में सोना खरीदा है। वर्तमान में RBI के पास लगभग 115 बिलियन डॉलर मूल्य का सोना है, जो कुल रिज़र्व का 16-17% है। यह संकट के समय डॉलर के मुकाबले एक बेहद सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माना जाता है।
घरेलू संपत्ति की ताकत: वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय परिवारों (Households) के पास रखा हुआ पारंपरिक सोना भारत की कुल जीडीपी (लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर) से भी अधिक मूल्य का है। हालांकि यह सोना सीधे तौर पर देश की मुख्य आर्थिक उत्पादक धारा में शामिल नहीं है, लेकिन यह देश की आंतरिक आर्थिक रीढ़ को एक सांस्कृतिक और सामाजिक मजबूती देता है।
‘पारदर्शिता’ बेहद जरूरी
कुल मिलाकर, वर्तमान स्थिति यह साफ़ करती है कि सरकार और RBI ने सोना बेचने की बात को सिरे से नकार दिया है, जिससे तात्कालिक घबराहट शांत हुई है। लेकिन वैश्विक स्तर पर मंडरा रहे कच्चे तेल के संकट, ईरान-अमेरिका तनाव और रुपये पर लगातार बनते दबाव को देखते हुए भारत को आने वाले दिनों में अत्यधिक सतर्क रहने की ज़रूरत है। अर्थव्यवस्था को लेकर किसी भी प्रकार के संशय को समाप्त करने का एकमात्र जरिया सरकारी आंकड़ों और निर्णयों में पूरी ‘पारदर्शिता’ होना ही है।

