
रांची। झारखंड के एक धार्मिक कार्यक्रम में इस्लामिक स्कॉलर मौलाना(Maulana) जर्जिस अंसारी के भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम को लेकर दिए गए बयान के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। मौलाना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि भगवान श्रीकृष्ण मूल रूप से मुस्लिम थे और उन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं का पालन किया। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के एक श्लोक का हवाला भी दिया। बयान सामने आने के बाद कई संतों, हिंदू संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने इसका विरोध जताते हुए इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा संवेदनशील मामला बताया है।
गीता के श्लोक का हवाला देकर रखा अपना पक्ष
मौलाना(Maulana) जर्जिस अंसारी ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) के दसवें श्लोक में जिस साधना और एकाग्रता का वर्णन किया गया है, वह उनके अनुसार नमाज की प्रक्रिया से मेल खाती है। इसी आधार पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम को लेकर अपने दावे पेश किए। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों के बीच बहस का विषय बन गया है। एक वर्ग इस बयान का विरोध कर रहा है, जबकि कुछ लोग इसे व्यक्तिगत व्याख्या बता रहे हैं।
मौलाना द्वारा उद्धृत श्लोक इस प्रकार है—
“योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।”
श्लोक का पारंपरिक अर्थ और बढ़ता विवाद
गीता के पारंपरिक भाष्यों और संस्कृत विद्वानों के अनुसार यह श्लोक ध्यानयोग का हिस्सा है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि साधक को एकांत में रहकर, मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए तथा सांसारिक इच्छाओं और संग्रह की भावना से मुक्त होकर परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। अधिकांश पारंपरिक व्याख्याओं में इस श्लोक को योग साधना और आत्मसंयम का संदेश माना गया है।
मौलाना(Maulana) की व्याख्या के सामने आने के बाद कई संतों और हिंदू संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि किसी भी धार्मिक ग्रंथ की ऐसी व्याख्या करना, जिससे दूसरे धर्म के संदर्भ में निष्कर्ष निकाला जाए, उचित नहीं है। कई संगठनों ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताते हुए बयान की निंदा की है। वहीं सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर पक्ष और विपक्ष में लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
फिलहाल इस मामले में किसी सक्षम सरकारी प्राधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक कार्रवाई या बयान सामने नहीं आया है। यह मामला धार्मिक व्याख्याओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस का विषय बन गया है। ऐसे मामलों में किसी भी दावे को तथ्य के रूप में स्वीकार करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ और प्रमाण की स्वतंत्र रूप से जांच करना आवश्यक है।

