छत्तीसगढ़ में सुशासन तिहार या नई मुसीबत?
जनता के आक्रोश और अफसरों की बगावत के बीच घिरी विष्णुदेव सरकार!

रायपुर (उज्ज्वल भूमि)। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव सरकार का महत्वाकांक्षी ‘सुशासन तिहार’ अभियान आगामी 10 जून को समाप्त होने जा रहा है। बीती 1 मई से शुरू हुए इस 35 दिवसीय अभियान के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना और यह संदेश देना था कि राज्य की भाजपा सरकार को आम जनता की फिक्र है। सरकार का दावा था कि इस अभियान के जरिए जनता की हर परेशानी का समाधान मौके पर ही किया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। इन 35 दिनों के भीतर प्रदेश में जो कुछ भी हुआ, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सुशासन तिहार अब खुद सरकार पर ही भारी पड़ने लगा है?
सिर्फ वोट तक सीमित रह गई जनता?
आज के दौर में लोकतंत्र की परिभाषा बदलती नजर आ रही है। भारत का मूल आधार ‘लोकतंत्र’ अब सियासतदारों की जेब में पड़े उस ‘चूर्ण’ की तरह हो गया है, जो वक्त आने पर किसी के काम नहीं आता। मौजूदा राजनीति में जनता का अधिकार सिर्फ पोलिंग बूथ पर वोट देने तक सीमित होकर रह गया है। उनके असल अधिकारों का जैसे कोई मोल ही नहीं बचा है। बात सिर्फ नेताओं या मंत्रियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नौकरशाहों (Bureaucrats) का रवैया भी आम जनता के खिलाफ नजर आता है, जिसका खामियाजा आखिरकार प्रदेश की जनता को ही भुगतना पड़ता है।
शुरुआती उत्साह के बाद ‘झटके पर झटका’
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद शुरुआती दौर में जनता के बीच भारी उत्साह था। जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर भाजपा पर भरोसा जताया था। सरकार ने भी शुरुआत में ‘महतारी वंदन योजना’, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ और ‘3100 रुपये धान का समर्थन मूल्य’ जैसी योजनाएं लागू कर जनता को यह अहसास कराया कि उनका फैसला सही था। लेकिन इसके बाद फैसलों के सिलसिले ने जनता को झटके देने शुरू किए।
सरकार के इन कदमों से प्रदेश के भीतर विपक्ष को बैठे-बिठाए कई बड़े मुद्दे मिल गए। हालांकि विपक्ष इन्हें उस तरह भुना नहीं पाया, लेकिन जनता के मन में सरकार के प्रति खटास जरूर पैदा हो गई।
इन मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरी जनता:
- संविदा कर्मचारी: नियमितीकरण और अन्य मांगों को लेकर संविदा कर्मियों का गुस्सा फूटा।
- बिजली उपभोक्ता: घरेलू बिजली की दरों और समस्याओं को लेकर उपभोक्ताओं में आक्रोश भड़का।
- सरकारी कर्मचारी: अधिकारी-कर्मचारियों ने ‘कलम बंद हड़ताल’ कर कामकाज ठप कर दिया।
- महिलाएं (महतारियां): अपनी मांगों को लेकर प्रदेश की महिलाएं सड़कों पर उतर आईं।
- आदिवासी समाज: बस्तर और अन्य आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन अब भी जारी है।
समाधान कम, नई समस्याओं ने घेरा:
आक्रोश की इस भड़की हुई आग को शांत करने के लिए सरकार ने ‘सुशासन तिहार’ और सुशासन शिविरों के बहाने जनता की नब्ज टटोलने का प्रयास किया था। लेकिन इन 35 दिनों में पुरानी समस्याओं का निदान होने के बजाय नई मुसीबतें खड़ी हो गईं।
दरअसल, सुशासन शिविरों के मंच से सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति सत्ताधीशों (नेताओं और मंत्रियों) का जो रवैया रहा, उसने नौकरशाही में एक नई चिंगारी सुलगा दी है। आम जनता का आरोप है कि पिछले कुछ समय से लोकसेवक जनता के जरूरी कामों को अटकाकर दफ्तरों के चक्कर कटवा रहे थे। अब जब सुशासन तिहार के शिविरों में इन अधिकारियों को सार्वजनिक मंचों पर मंत्रियों और नेताओं द्वारा बुरी तरह लताड़ा गया, तो उनके खून के आंसू निकल आए।
नतीजतन, नेताओं की इस फटकार से आहत होकर अब अधिकारी-कर्मचारी संगठनों ने सरकार के खिलाफ आंदोलन करने की चेतावनी दे डाली है। प्रशासनिक हल्कों में यह भी चर्चा है कि जनता के सामने अफसरों को डांटना नेताओं की सिर्फ ‘रीलबाजी’ और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का जरिया है।

