ममता बनर्जी की सियासी दुनिया में बड़ा बदलाव, 5 महीने में TMC के नाम-सिंबल से लेकर विधायकों तक बदली तस्वीर

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को लेकर जारी आंतरिक विवाद ने पार्टी की सियासी तस्वीर बदल दी है। 5 मई 2026 को ममता बनर्जी ने कोलकाता के कालीघाट में मीडिया से बातचीत के दौरान खुद को ‘स्ट्रीट फाइटर’ बताते हुए कहा था कि चुनाव में हार-जीत उनके लिए मायने नहीं रखती और वह सड़क पर संघर्ष करती रहेंगी। उस समय उन्होंने दावा किया था कि चुनाव में TMC के 80 विधायक जीतकर आए हैं।
करीब पांच महीने बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व, नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद सामने है। 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाले आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और फ्री सिंबल चुनने का निर्देश दिया है। यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू की गई है।
28 साल पुरानी पार्टी पहचान पर संकट
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। करीब 28 साल बाद पार्टी के भीतर दो गुटों के बीच नियंत्रण को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। आयोग ने कहा है कि अंतिम निर्णय होने तक दोनों गुट मूल पार्टी के नाम और आरक्षित चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
दोनों पक्षों को अपने लिए तीन-तीन पसंदीदा नाम और तीन-तीन फ्री चुनाव चिन्ह बताने को कहा गया है। इसके बाद आयोग दोनों गुटों के लिए एक-एक नाम और चिन्ह आवंटित करेगा।
‘जोड़ाफूल’ की जगह नया चुनाव चिन्ह
तृणमूल कांग्रेस की पहचान लंबे समय से ‘घास पर दो फूल’ वाला चुनाव चिन्ह रहा है। आयोग के अंतरिम आदेश के बाद आगामी उपचुनावों में दोनों गुट इस आरक्षित चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ममता बनर्जी के गुट को अस्थायी तौर पर नया नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है। हालांकि, आयोग का अंतरिम आदेश मूल TMC नाम और चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक से संबंधित है और अंतिम विवाद का निर्णय अभी बाकी है।
विधायकों और सांसदों की संख्या को लेकर दावे
दी गई रिपोर्ट के मुताबिक 5 मई को ममता बनर्जी के साथ 80 विधायक और 28 लोकसभा सांसद थे। अब दावा किया जा रहा है कि पार्टी के भीतर विभाजन के बाद उनके साथ करीब 20 विधायक और 8 सांसद रह गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 60 विधायकों के एक अलग गुट ने मूल TMC पर अपना दावा पेश किया है। चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों की ओर से पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण और पहचान को लेकर दस्तावेज और दावे पेश किए गए हैं। आयोग को इस विवाद पर अंतिम निर्णय लेना है।
करीबी नेताओं के अलग होने का दावा
रिपोर्ट में ममता बनर्जी के पुराने सहयोगियों के पार्टी से अलग होने या उनके साथ नहीं रहने का भी उल्लेख किया गया है। इसमें फिरहाद हकीम, अणुब्रत मंडल, अरूप राय और सुदीप बंद्योपाध्याय जैसे नेताओं का नाम लिया गया है।
वहीं, पार्टी के पुराने नेताओं में सुब्रत मुखर्जी का निधन हो चुका है, जबकि पार्थ चटर्जी जेल में हैं। मुकुल राय भी लंबे समय से TMC की सक्रिय राजनीति से बाहर हैं।
पार्टी में अंदरूनी खींचतान की तीन वजहें
1. पुराने नेताओं का साथ छूटना
रिपोर्ट के मुताबिक ममता बनर्जी के कई पुराने और भरोसेमंद नेताओं के निधन या कानूनी मामलों में फंसने के बाद पार्टी का पुराना नेतृत्व ढांचा कमजोर हुआ।
2. अभिषेक बनर्जी को लेकर मतभेद
चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने का दावा किया गया है। कुछ नेताओं ने उन्हें निशाने पर लिया, जबकि ममता बनर्जी ने इसे साजिश बताया।
3. सत्ता से बाहर होने का असर
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार से बाहर होने के बाद पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ चल रहे मामलों ने भी संगठन के भीतर असंतोष को बढ़ाया। इनमें ज्योतिप्रिय मल्लिक, अरूप राय और अणुब्रत मंडल के नाम शामिल किए गए हैं।
चुनाव आयोग के फैसले के बाद अगला कदम क्या?
फिलहाल TMC के नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिन्ह को लेकर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग नाम और चुनाव चिन्ह चुनने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह अंतरिम व्यवस्था है और पार्टी की पहचान पर अंतिम निर्णय बाद की प्रक्रिया में होगा।



