MCB NEWS : मौत का कुंआ और जिंदगी की तलाश

MCB NEWS : सूरज अभी उगा भी नहीं था। आसमान में भोर की लालिमा और रात के अंधेरे का धुंधलका आपस में गुत्थमगुत्था हो रहे थे। लेकिन छत्तीसगढ़ के नवगठित मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले के एक सुदूर वनांचल गांव की पगडंडियों पर पैरों की आहट गूंजने लगी थी। यह आहट थी बुद्धिमनिया और उसके दस साल के बेटे रामू के कदमों की। दोनों के हाथों में खाली बर्तन थे, जिनकी खनक इस सन्नाटे में किसी खौफनाक चेतावनी की तरह गूंज रही थी।
यह कोई सुबह की सैर नहीं थी, न ही यह किसी खेत की ओर जाने का आम रास्ता था। यह सफर था रोज़मर्रा के उस युद्ध का, जिसमें दांव पर किसी की जीत नहीं, बल्कि सिर्फ एक घूंट ‘जिंदगी’ लगी थी।
गांव में पानी का अकाल था। हैंडपंप महीनों से सूखे पड़े थे, मानो धरती मां ने अपनी छाती का आखिरी कतरा भी समेट लिया हो। सरकारी दावों के कागजी नल जल योजना के पाइप सूखे पड़े थे और उनमें सिर्फ धूल भरी हवाएं सरसराती थीं। पूरे गांव की प्यास अब निर्भर थी एक गहरे, जर्जर और पथरीले कुएं पर। एक ऐसा कुंआ, जो पानी का स्रोत कम और मौत का साया ज्यादा नजर आता था।
जब बुद्धिमनिया और रामू कुएं पर पहुंचे, तो वहां पहले से ही गांव की कई औरतें और बूढ़े कतार में खड़े थे। कुएं का मुंह बहुत संकरा था और जब भीतर झांककर देखो, तो घोर अंधकार के सिवाय कुछ नजर नहीं आता था। पथरीली दीवारों पर काई जमी थी। इस कुएं में पानी खींचने के लिए रस्सी-बाल्टी काम नहीं आती थी, क्योंकि पानी इतनी गहराई में चला गया था कि नीचे सिर्फ एक पतली सी कीचड़ युक्त जलधारा बची थी।
वहां पानी ‘खींचा’ नहीं जाता था, पानी ‘चुराया’ जाता था—अपनी जान को हथेली पर रखकर।
“आज मेरी बारी है, दाई,” रामू ने अपनी मां का पल्लू पकड़ते हुए धीरे से कहा। उसकी मासूम आंखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी परिपक्वता थी, जो वक्त से पहले ही गरीबी और अभाव ने उसे दे दी थी।
बुद्धिमनिया का कलेजा कांप उठा। उसने अपने दस साल के जिगर के टुकड़े को देखा। पसलियां साफ नजर आ रही थीं, पैर नंगे थे। इसी कुएं के भीतर जाकर पानी लाना था। वह जानती थी कि जरा सा पैर फिसला, तो नीचे पत्थरों से टकराकर उसकी दुनिया उजड़ जाएगी। लेकिन घर में उसकी बूढ़ी सास प्यास से तड़प रही थी और तीन साल की छोटी बेटी का गला सूखा जा रहा था। पानी नहीं मिला, तो वे वैसे ही मर जाएंगे।
“सम्भल के उतरना बाबू… दीवार को कस के पकड़ना,” बुद्धिमनिया ने कांपती आवाज में कहा। उसके आंसू उसकी आंखों के कोरों में ही सूख गए थे, क्योंकि रोने के लिए भी शरीर में पानी की जरूरत होती है, जो अब उनके पास बचा नहीं था।
रामू ने कुएं की मुंडेर को पकड़ा। उसके छोटे-छोटे पैर कुएं की पथरीली दीवारों के उन खांचों को ढूंढने लगे, जिन्हें गांव वालों ने पैर टिकाने के लिए खुरच-खुरच कर बनाया था। वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। कुएं के मुंह पर खड़ी औरतों ने अपनी सांसें रोक लीं। पूरा माहौल ऐसा था मानो किसी श्मशान में सन्नाटा पसर गया हो।
नीचे जैसे-जैसे रामू जा रहा था, हवा कम होती जा रही थी। उमस और अजीब सी गंध से उसका दम घुटने लगा। ऊपर से उसकी मां चिल्ला रही थी, “रामू… बेटा, आवाज दे।”
“हौ दाई… ठीक हूं,” नीचे से एक बेहद कमजोर और गूंजती हुई आवाज आई।
दीवारों पर जमी काई की वजह से रामू का एक पैर फिसला। उसने चीखते हुए एक नुकीले पत्थर को पकड़ा। पत्थर उसकी नाजुक हथेली में धंस गया। खून की एक पतली धार बह निकली, जो कुएं की अंधेरी दीवार पर विलीन हो गई। दर्द से उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन उसने रोने की आवाज बाहर नहीं आने दी, ताकि ऊपर खड़ी मां का दिल न बैठ जाए।
आखिरकार वह कुएं के तल तक पहुंचा। वहां पानी नाममात्र का था। पत्थरों के बीच रिसते हुए मटमैले पानी को चम्मच और छोटी कटोरी से समेटकर डिब्बे में भरना था। रामू घुटनों के बल बैठ गया। वह एक-एक बूंद पानी बटोरने लगा। एक कटोरी, दो कटोरी… हर बूंद के साथ वह अपनी और अपने परिवार की सांसें जोड़ रहा था।
ऊपर खड़ी बुद्धिमनिया का हर पल एक युग की तरह बीत रहा था। वह कुएं के मुंह पर झुककर लगातार नीचे देख रही थी। उसकी आंखों से आखिरकार आंसू टपक ही पड़े और सीधे कुएं के अंधेरे में गिर गए। शायद धरती के इतिहास में यह पहली बार नहीं हो रहा था कि किसी मां के आंसुओं का खारापन, उस कुएं के मीठे पानी को सींच रहा था।
करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद रामू ने छोटे डिब्बे को पूरा भरा। अब परीक्षा की घड़ी थी—ऊपर चढ़ने की। पानी के डिब्बे को एक पतली रस्सी से बांधकर उसने ऊपर भेजा। बुद्धिमनिया ने उसे खींचा, जैसे वह पानी नहीं, अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा खजाना खींच रही हो।
अब रामू को ऊपर आना था। लेकिन इस बार उसके हाथ लहूलुहान थे और शरीर थककर चूर हो चुका था। उसने चढ़ना शुरू किया। दो फीट, चार फीट… अचानक ऊपर से एक छोटा पत्थर ढीला होकर सीधे रामू के सिर पर गिरा। रामू के मुंह से एक चीख निकली और उसकी पकड़ ढीली हो गई।
“रामू!” बुद्धिमनिया की चीख पूरे जंगल में गूंज गई। वह कुएं के भीतर कूदने के लिए तैयार हो गई, लेकिन वहां खड़ी दूसरी औरतों ने उसे पकड़ लिया।
नीचे, रामू ने अपनी आखिरी ताकत झोंक दी थी। उसने गिरने से ठीक पहले एक मजबूत जड़ को पकड़ लिया था। उसका सिर घूम रहा था, चोट से खून टपक रहा था। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी मां की उस चीख को सुना था, जिसमें ममता की तड़प थी। रेंगते हुए, हांफते हुए, अपनी बची-खुची जिंदगी को समेटते हुए रामू का सिर कुएं के मुंडेर से बाहर आया।
बुद्धिमनिया ने झपटकर अपने बच्चे को छाती से लगा लिया। रामू का खून और बुद्धिमनिया के आंसू आपस में मिल गए। वहां मौजूद हर आंख रो पड़ी। पत्थरों का दिल भी शायद पिघल गया होता, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था का दिल नहीं पिघला।
यह कहानी सिर्फ रामू या बुद्धिमनिया की नहीं है। यह छत्तीसगढ़ के उस अंचल की हकीकत है, जहां आज भी 21वीं सदी में, डिजिटल इंडिया के दौर में, इंसानों को पानी के लिए ‘मौत के कुएं’ में उतरना पड़ता है। जहां हर सुबह सूरज रोशनी लेकर नहीं, बल्कि एक नया खौफ लेकर आता है।
जब बुद्धिमनिया और रामू पानी का वह छोटा सा डिब्बा लेकर घर लौटे, तो छोटी बच्ची ने दौड़कर पानी पिया। उसकी तृप्त आंखों को देखकर रामू मुस्कुरा दिया, अपनी चोट के दर्द को भूलकर। लेकिन सवाल यह है कि यह तृप्ति कब तक रहेगी? कल सुबह फिर वही कुंआ होगा, वही अंधेरा होगा और वही मौत का खेल होगा।
क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि हम इस व्यथा को सिर्फ एक खबर समझकर छोड़ दें? क्या रामू के सिर से बहता खून और उसकी मां के आंसू हमारे सभ्य समाज के मुंह पर एक तमाचा नहीं हैं?
इस कहानी को सिर्फ पढ़ें नहीं, बल्कि इसे हर उस इंसान तक पहुंचाएं जो महलों में बैठकर पानी की बर्बादी करता है, और उन हुक्मरानों तक भी, जिनके दावों के घड़े भरे हैं, लेकिन आदिवासियों के बर्तन आज भी खाली हैं। शेयर कीजिए ताकि इस ‘मौत के कुएं’ को बंद कर वहां ‘जिंदगी का नल’ पहुंचाया जा सके।

