‘सौतेला’ बिलासपुर मंजूर नहीं!
बिलासपुर : अरपा पार को अलग नगर निगम बनाने 'आर-पार' की जंग

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर को दो हिस्सों में बांटने वाली जीवनदायिनी अरपा नदी आज सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि एक गहरी प्रशासनिक और बुनियादी असमानता की गवाह बन चुकी है। नदी के एक तरफ जहां मुख्य शहर की चकाचौंध और प्रशासनिक ध्यान है, वहीं दूसरी तरफ ‘अरपा पार’ (सरकंडा और उससे लगे दर्जनों वार्ड व ग्रामीण अंचल) बदहाली, उपेक्षा और अनियोजित विकास के आंसुओं में डूबा हुआ है। इस बदहाली से तंग आकर अब अरपा पार के जागरूक नागरिकों ने व्यवस्था को जड़ से बदलने का मन बना लिया है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की तर्ज पर अब अरपा पार को एक नया और स्वतंत्र नगर निगम बनाने की मांग एक बार फिर सुलग उठी है। इसी सिलसिले में क्षेत्र के हितों के लिए संघर्षरत संगठन ‘नागरिक सुरक्षा मंच’ ने 25 तारीख को एक विशाल धरने और आंदोलन का ऐलान किया है। यह आंदोलन केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि अरपा पार के लाखों लोगों के उस दर्द की अभिव्यक्ति है जिसे लंबे समय से शासन-प्रशासन द्वारा ‘सामान्य’ मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा है।

बिलासपुर का वोट बैंक, विकास में ‘शून्य’
अरपा पार का क्षेत्र, जिसे स्थानीय लोग ‘अर्पांचल’ भी कहते हैं, बिलासपुर नगर निगम को सरकार बनाने और जिताने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। सरकंडा, मोपका, चिलाहटी, साइंस कॉलेज के पीछे का हिस्सा और इससे जुड़े लगभग 30 से अधिक गांवों की सीमाएं इस क्षेत्र को एक विशाल जनसांख्यिकी का रूप देती हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जब बजट और विकास कार्यों के आवंटन की बात आती है, तो इस क्षेत्र के हिस्से केवल आश्वासन और अधूरी योजनाएं ही आती हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कहने को तो बिलासपुर ‘स्मार्ट सिटी’ है, लेकिन अरपा पार की सड़कों पर आज भी गड्ढे, धूल और जलभराव का साम्राज्य है। सीवरेज व्यवस्था का पूरा कचरा और गंदा पानी बिना उचित ट्रीटमेंट के अरपा नदी में बहाया जा रहा है, जिससे पूरा क्षेत्र मच्छरों के प्रकोप और मौसमी बीमारियों की चपेट में है।
बुनियादी सुविधाओं का अकाल:
हजारों की आबादी वाले इस विशाल अर्पांचल में आज भी एक सर्वसुविधायुक्त सरकारी अस्पताल या बड़ा ट्रॉमा सेंटर नहीं है। यदि रात के समय किसी मरीज की तबीयत बिगड़ जाए, तो उसे उफनती नदी के पुलों को पार कर सिम्स (CIMS) या जिला अस्पताल भागना पड़ता है। कई बार जाम और दूरी के कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा, क्षेत्र में व्यवस्थित खेल मैदान, सुसज्जित पार्क, सुगम यातायात प्रबंधन और शुद्ध पेयजल आपूर्ति जैसी मूलभूत आवश्यकताएं भी दम तोड़ रही हैं।
कब से चल रही है मांग और अब तक क्या हुआ?
अरपा पार को एक पृथक प्रशासनिक इकाई या स्वतंत्र नगर निगम बनाने की मांग नई नहीं है, बल्कि यह पिछले एक दशक से अधिक समय से समय-समय पर उठती रही है। जब भी बिलासपुर के सीमा विस्तार की बात आई, तब-तब स्थानीय बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक सुरक्षा मंच जैसे संगठनों ने यह आवाज बुलंद की कि बिलासपुर नगर निगम का भौगोलिक दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि एक ही मुख्यालय से पूरे शहर का समान विकास असंभव है।
वर्ष 2019-20 का सीमा विस्तार: जब बिलासपुर के आस-पास के कई ग्रामीण क्षेत्रों और पंचायतो को निगम में शामिल किया गया, तब उम्मीद थी कि अरपा पार को विशेष पैकेज या अलग जोन के रूप में स्वायत्तता मिलेगी, लेकिन इसे सिर्फ कागजों तक सीमित रखा गया।
आंदोलनों का इतिहास: इससे पहले भी नागरिक मंचों द्वारा क्रमिक भूख हड़ताल, मानव श्रृंखला, मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने के अनगिनत दौर चले हैं। हर बार चुनावों के समय राजनीतिक दल इसे अपने घोषणापत्रों और वादों में शामिल तो करते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
शासन-प्रशासन का रवैया: सिर्फ आश्वासन की घुट्टी
इस न्यायोचित मांग को लेकर शासन और नगरीय प्रशासन विभाग का रवैया हमेशा से टालमटोल और उदासीनता का रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का पारंपरिक तर्क होता है कि एक नया नगर निगम बनाने में भारी वित्तीय बोझ बढ़ेगा और नए बुनियादी ढांचे (जैसे नया निगम दफ्तर, नया प्रशासनिक अमला, संसाधन) के लिए बड़ा बजट चाहिए।
हालांकि, आर्थिक और नगरीय मामलों के विशेषज्ञ इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं। उनका मानना है कि यदि अरपा पार अलग निगम बनता है, तो उसे केंद्र और राज्य सरकार से स्वतंत्र विकास अनुदान (Grants) मिलेगा, जिससे राजस्व की कमी नहीं होगी बल्कि विकास की गति दोगुनी हो जाएगी। शासन द्वारा जनता की इस बेहद जरूरी भावना को लगातार दबाने से अब आम जन का धैर्य जवाब दे रहा है।
भोपाल की तर्ज ही क्यों है एकमात्र समाधान?
आंदोलनकारियों का तर्क बेहद व्यावहारिक और तार्किक है। उनका कहना है कि जिस तरह भोपाल में बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल और आबादी के प्रशासनिक संतुलन के लिए पृथक जोन और कोलार जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गईं, उसी तरह बिलासपुर में भी अरपा नदी को एक प्राकृतिक सीमा मानकर ‘उत्तर बिलासपुर’ (मुख्य शहर) और ‘पूर्वी-उत्तरी बिलासपुर’ (अरपा पार नगर निगम) का गठन किया जाना चाहिए। इससे:
विकेंद्रीकृत प्रशासन: अरपा पार के लोगों को छोटे-छोटे प्रमाण पत्र, राशन कार्ड या फाइलों की मंजूरी के लिए नदी पार कर मुख्य दफ्तर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
फोकस्ड बजट: अरपा पार से वसूला जाने वाला भारी-भरकम टैक्स सीधे इसी क्षेत्र के विकास, सड़कों, आधुनिक नालियों और स्ट्रीट लाइट व्यवस्था पर खर्च हो सकेगा।
रोजगार और स्वास्थ्य: क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर शासकीय दफ्तर, बड़ा अस्पताल और कमर्शियल हब विकसित होंगे, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
आर-पार की लड़ाई का शंखनाद
नागरिक सुरक्षा मंच द्वारा 25 तारीख को आयोजित धरना प्रदर्शन इसी सिलसिले में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम माना जा रहा है। मंच के पदाधिकारियों का साफ कहना है कि यह लड़ाई अब किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि अरपा पार के हर उस नागरिक की है जो टैक्स तो पूरा भरता है लेकिन बुनियादी सुविधाओं के मामले में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। यदि इस धरने के बाद भी शासन-प्रशासन की नींद नहीं खुली, तो आने वाले समय में उग्र आंदोलन, चक्काजाम और आगामी चुनावों के बहिष्कार जैसे कड़े कदम उठाए जाएंगे।
समय आ गया है कि छत्तीसगढ़ सरकार न्यायधानी के इस हिस्से के साथ हो रहे ‘सौतेले व्यवहार’ को बंद करे और अरपा पार की अस्मिता, सुरक्षा व विकास के लिए ‘पृथक नगर निगम’ की मांग पर तुरंत मुहर लगाए।

