आदिवासी अधिकारों को लेकर कांग्रेस का बड़ा प्रस्ताव, सरकार के सामने रखीं 12 मांगें
जल-जंगल-जमीन से आरक्षण तक, कांग्रेस ने आदिवासी मुद्दों पर खोला मोर्चा

रायपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस(Congress) ने आदिवासी मुद्दों को लेकर शुक्रवार को राजधानी रायपुर स्थित राजीव भवन में बड़ी बैठक आयोजित की। बैठक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव और पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू समेत कई वरिष्ठ आदिवासी नेता शामिल हुए। बैठक में आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन, खनिज संसाधनों की सुरक्षा, वन अधिकार, पेसा कानून, आरक्षण और रोजगार जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
आदिवासियों से जुड़ा मुद्दे पर 12 बिंदुओं का राजनीतिक प्रस्ताव पारित
बैठक के दौरान कांग्रेस(Congress) ने 12 बिंदुओं वाला एक राजनीतिक और सामाजिक प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में राज्य और केंद्र सरकार से आदिवासियों से जुड़े कई मुद्दों पर कार्रवाई की मांग की गई। कांग्रेस ने कहा कि हसदेव अरण्य, परसा ईस्ट केते बासन, केते एक्सटेंशन समेत नई खदानों और अन्य परियोजनाओं के लिए दी गई वन भूमि डायवर्जन और लाखों पेड़ों की कटाई की अनुमति को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। पार्टी का कहना है कि इससे आदिवासियों की आजीविका और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
आदिवासियों के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण की करी मांग
बैठक में आदिवासियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में 32 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग भी उठाई गई। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि राजभवन में लंबित आरक्षण विधेयक की अधिसूचना जारी कर सरकार को इस विषय पर फैसला लेना चाहिए। इसके अलावा वन अधिकार अधिनियम के तहत पात्र लोगों को वनाधिकार पट्टे देने की मांग भी की गई।
कांग्रेस(Congress) ने नक्सल प्रभावित इलाकों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। प्रस्ताव में कहा गया कि नक्सली हिंसा और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच फंसे कई निर्दोष आदिवासी अपने गांव छोड़कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हुए हैं। ऐसे लोगों को वापस बसाने और हिंसा या कथित फर्जी मुठभेड़ों के पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने की मांग की गई। साथ ही पार्टी ने दावा किया कि नक्सली सहयोगी होने के आरोप में बड़ी संख्या में निर्दोष आदिवासी जेलों में बंद हैं। कांग्रेस ने ऐसे मामलों की समीक्षा कर उनकी रिहाई और आदिवासियों के खिलाफ जारी हजारों स्थायी एवं अस्थायी वारंट खत्म करने की मांग की।
बैठक में संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और ग्राम सभाओं के अधिकारों की रक्षा का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया। कांग्रेस का कहना है कि अनुसूचित क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण के मामलों में ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि कई मामलों में ग्राम सभाओं के अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है।
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर भी कांग्रेस ने अपनी राय रखी। प्रस्ताव में कहा गया कि आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, विवाह प्रणाली और सांस्कृतिक पहचान को देखते हुए उन्हें यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए ताकि उनकी परंपराओं और अधिकारों पर असर न पड़े।
रोजगार के मुद्दे पर कांग्रेस ने बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की मांग की। पार्टी ने बंद पड़े स्कूलों को फिर से शुरू करने और विशेष भर्ती अभियान चलाने की बात भी कही।बैठक में कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा। प्रस्ताव में कहा गया कि आदिवासियों को ‘वनवासी’ कहकर उनकी मूल पहचान को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान को लेकर स्पष्ट है और उसे बदलने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा।
इसके अलावा आगामी जनगणना में आदिवासियों की अलग और स्पष्ट पहचान दर्ज करने के लिए अलग कॉलम बनाए जाने की मांग भी बैठक में रखी गई। कांग्रेस का कहना है कि इससे आदिवासी समुदाय की वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति का सही आंकलन हो सकेगा।
बैठक में आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जनक ध्रुव, पूर्व मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, पूर्व मंत्री अनिला भेड़िया, विधायक विद्यावती सिदार, लालजी सिंह राठिया, फूल सिंह राठिया, अंबिका मरकाम, इंद्र शाह मंडावी, सावित्री मंडावी समेत बड़ी संख्या में वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधि तथा संगठन के पदाधिकारी मौजूद रहे। कांग्रेस ने संकेत दिया कि आने वाले समय में आदिवासी अधिकारों और स्थानीय मुद्दों को लेकर प्रदेशभर में राजनीतिक अभियान भी चलाया जा सकता है।

