FCRA संशोधन बिल से पहले सरकार का बड़ा बयान: विदेशी फंडिंग लोकतंत्र को कर सकती है प्रभावित, दुनिया के कई देशों में भी सख्त कानून

दिल्ली। संसद में विदेशी अंशदान विनियमन (FCRA) संशोधन विधेयक पर चर्चा से पहले केंद्र सरकार ने विदेशी फंडिंग को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है।
गृह मंत्रालय (MHA) ने कहा कि विदेशी धन का अनियंत्रित प्रवाह लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रिया और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है।
यही वजह है कि भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे कई लोकतांत्रिक देशों ने भी पिछले कुछ वर्षों में विदेशी फंडिंग से जुड़े कानूनों (FCRA) को और सख्त किया है।
गृह मंत्रालय ने अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) और ब्रिटेन की फॉरेन इन्फ्लुएंस रजिस्ट्रेशन स्कीम-2025 का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विदेशी प्रभाव से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों के लिए पंजीकरण अनिवार्य है।
नियमों का उल्लंघन करने पर जेल तक का प्रावधान है। यूरोपीय संघ भी गैर-ईयू सरकारों की ओर से होने वाली लॉबिंग के लिए पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि FCRA का उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को विदेशी फंड लेने से रोकना नहीं है। सरकार के अनुसार, वर्ष 2024-25 में 16,200 से अधिक संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत रहीं और उन्हें करीब 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ।
प्रस्तावित संशोधन के तहत यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनाई गई उसकी संपत्तियों का प्रबंधन सरकार द्वारा अधिकृत प्राधिकरण कर सकेगा। हालांकि, धार्मिक स्थलों का स्वरूप यथावत रहेगा और प्रभावित संस्थाओं को अपील का अधिकार भी मिलेगा।
सरकार विदेशी नागरिकों को पंजीकृत संस्थाओं में महत्वपूर्ण प्रबंधन पदों पर नियुक्त करने पर भी रोक लगाने की तैयारी में है। मंत्रालय का कहना है कि इससे विदेशी अंशदान का संचालन केवल भारत से सत्यापित संबंध रखने वाले लोगों के माध्यम से होगा।
गृह मंत्रालय ने दोहराया कि FCRA किसी धर्म, समुदाय या वैध सामाजिक संस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

