मेट्रो शहरों में किराए का संकट गहराया, मिडिल क्लास की आधी कमाई रेंट में खर्च

दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े मेट्रो शहरों में मकानों के किराए में पिछले कुछ वर्षों के दौरान रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रियल एस्टेट बाजार के आंकड़ों के अनुसार कई प्रमुख इलाकों में किराया 100 से 150 प्रतिशत तक बढ़ चुका है, जिससे मिडिल क्लास परिवारों का बजट बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड, गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड और मुंबई के प्रीमियम इलाकों में किराए में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया है। जहां कुछ साल पहले 2 बीएचके फ्लैट 20 से 25 हजार रुपये मासिक किराए पर मिल जाते थे, वहीं अब कई जगहों पर इसी तरह के फ्लैट के लिए 50 हजार रुपये या उससे अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पहले नौकरीपेशा परिवार अपनी आय का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा किराए पर खर्च करते थे, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका असर बचत, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और अन्य वित्तीय योजनाओं पर पड़ रहा है।
दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में कई इलाकों में 3 बीएचके फ्लैट का किराया 75 हजार से 90 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच गया है। वहीं मुंबई के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में 2 बीएचके फ्लैट का मासिक किराया 1.20 लाख से 1.50 लाख रुपये तक दर्ज किया गया है। बेंगलुरु के आईटी हब क्षेत्रों में भी किराए में तेज बढ़ोतरी जारी है।
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के बाद कार्यालयों के दोबारा खुलने और कर्मचारियों की वापसी से किराए वाले मकानों की मांग तेजी से बढ़ी है। दूसरी ओर, उपलब्ध मकानों की संख्या सीमित रहने के कारण किराए लगातार ऊपर जा रहे हैं।
इस दौरान मकान मालिकों को भी बड़ा फायदा हुआ है। रिहायशी संपत्तियों की रेंटल यील्ड कई शहरों में बढ़कर 4 से 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसके चलते निवेशकों की रुचि रियल एस्टेट में बढ़ी है और हर साल किराए में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि देखने को मिल रही है।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि कई इलाकों में मकान का मासिक किराया और होम लोन की ईएमआई के बीच का अंतर काफी कम हो गया है। उदाहरण के तौर पर, जहां एक फ्लैट का किराया 70 से 80 हजार रुपये है, वहीं उसी श्रेणी की संपत्ति खरीदने पर ईएमआई 85 से 95 हजार रुपये के बीच आ रही है। ऐसे में कई लोग किराए पर रहने के बजाय घर खरीदने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते किराए और ईएमआई के बीच घटते अंतर ने युवाओं के बीच कम उम्र में घर खरीदने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। हालांकि, ऊंची संपत्ति कीमतें, डाउन पेमेंट की चुनौती और बैंकिंग शर्तें अभी भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
रियल एस्टेट बाजार में आए इस बदलाव ने ‘रेंट बनाम ईएमआई’ की बहस को और तेज कर दिया है। अब मिडिल क्लास परिवार केवल मासिक खर्च नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण को ध्यान में रखकर फैसले लेने लगे हैं।

