पश्चिम बंगाल में टीएमसी में बगावत तेज, 59 विधायकों ने नए गुट का दावा किया; दलबदल कानून के तहत स्पीकर की भूमिका अहम

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 59 बागी विधायक विधानसभा स्पीकर के समक्ष पहुंचे और नया गुट बनाने के साथ विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता देने का दावा पेश किया। बताया जा रहा है कि सभी विधायकों ने नए गुट के समर्थन में पत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं।
दलबदल विरोधी कानून के अनुसार किसी दल से अलग होने वाले गुट को अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों का समर्थन आवश्यक होता है। टीएमसी के कुल 80 विधायक हैं, ऐसे में न्यूनतम 54 विधायकों का समर्थन जरूरी था। बागी गुट के पास 59 विधायकों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा है, जिससे वे तकनीकी रूप से अयोग्यता से बच सकते हैं।
इस पूरे मामले में विधानसभा स्पीकर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत स्पीकर को यह अधिकार प्राप्त है कि वे तय करें कि संबंधित विधायक दलबदल के दोषी हैं या नहीं। साथ ही, किसी विभाजन या विलय को वैध मानने अथवा खारिज करने का अंतिम निर्णय भी स्पीकर ही लेते हैं।
91वें संविधान संशोधन के अनुसार यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल या गुट में शामिल होते हैं, तो उसे वैध विलय माना जा सकता है। हालांकि यह तय करना कि कानूनी शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं, स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने किहोतो होलोहान मामले (1992) में कहा था कि दलबदल मामलों में निर्णय लेते समय स्पीकर एक न्यायाधिकरण की तरह कार्य करते हैं। उनके फैसले को बाद में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
फिलहाल सभी की नजरें स्पीकर के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यही निर्णय तय करेगा कि बागी विधायक वैध रूप से नए गुट के रूप में मान्यता प्राप्त करेंगे या दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई का सामना करेंगे।

