पश्चिम एशिया संकट के बीच रिलायंस का बड़ा दांव, अफ्रीका और यूरोप में ईंधन निर्यात की हिस्सेदारी 50% बढ़ाई

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और ईंधन की सप्लाई प्रभावित हुई है। इस स्थिति का फायदा उठाते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने ईंधन निर्यात की रणनीति में बदलाव किया है। कंपनी ने पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका, भूमध्यसागरीय क्षेत्र तथा यूरोप के अन्य बाजारों में सप्लाई बढ़ाई है। सितंबर तिमाही की रिपोर्ट के मुताबिक, इन बाजारों में कंपनी की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी बढ़ गई है।
अफ्रीका और यूरोप के नए बाजारों पर फोकस
रिलायंस ने यूरोप और अफ्रीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, केन्या और तंजानिया में भी प्रीमियम पेट्रोल की बिक्री के नए अवसर तलाशे हैं। भूमध्यसागरीय बाजार में डीजल के साथ विमान ईंधन यानी एटीएफ की सप्लाई भी बढ़ाई गई है।
कंपनी ने पहली बार दक्षिण अफ्रीका को कम सल्फर वाला एटीएफ उपलब्ध कराया है। कंपनी के सप्लाई और ट्रेडिंग कारोबार के मुख्य परिचालन अधिकारी श्रीनिवासन तुट्टागुंटा के मुताबिक, भूमध्यसागरीय क्षेत्र में सप्लाई घटने से डीजल और जेट फ्यूल के निर्यात के बेहतर अवसर मिले हैं।
O2C कारोबार का मुनाफा 68 फीसदी बढ़ा
रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) कारोबार ने दूसरी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। इस कारोबार का राजस्व 44 फीसदी बढ़कर 2,31,601 करोड़ रुपए पहुंच गया। वहीं, ऑपरेटिंग मुनाफा यानी EBITDA में 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह 25,203 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में सालाना आधार पर 41 फीसदी की वृद्धि हुई। वहीं, परिवहन ईंधन की कीमतें 50 से 78 फीसदी तक बढ़ीं। रूस और पश्चिम एशिया में रिफाइनरी क्षमता प्रभावित होने से वैश्विक रिफाइनिंग मार्जिन में भी तेजी आई।
सितंबर तिमाही में गैसोलीन क्रैक बढ़कर करीब 25 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि एक साल पहले यह 8.4 डॉलर था। डीजल क्रैक 18.7 डॉलर से बढ़कर 65.8 डॉलर और जेट फ्यूल मार्जिन 16 डॉलर से बढ़कर 59.3 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया।
कच्चे तेल की खरीद और शिपिंग रणनीति में बदलाव
तिमाही के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत 70 से 130 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही। इसके साथ ही कच्चे तेल का प्रीमियम, मालभाड़ा और बीमा खर्च भी बढ़ गया। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव के बावजूद कंपनी ने कच्चे तेल की खरीद के लिए अमेरिका, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रों के विकल्पों का इस्तेमाल किया।
महंगे मालभाड़े का असर कम करने के लिए कंपनी ने 20 से अधिक जहाजों को परिचालन में लगाया। कच्चा तेल और तैयार ईंधन उत्पादों की ढुलाई करने वाले जहाजों की कुल संख्या करीब 25 हो गई। इससे शिपिंग संबंधी चुनौतियों के बावजूद कंपनी ने कच्चे तेल का प्रसंस्करण जारी रखा।
घरेलू मांग पूरी करने के लिए LPG उत्पादन दोगुना
विदेशी बाजारों में निर्यात बढ़ाने के साथ कंपनी ने घरेलू जरूरतों पर भी ध्यान दिया। भारत में पेट्रोल की खपत सालाना आधार पर 8.5 फीसदी और डीजल की मांग 7.5 फीसदी बढ़ी है। घरेलू मांग पूरी करने के लिए रिलायंस ने सामान्य एलपीजी का उत्पादन करीब दोगुना कर दिया। इसके लिए अल्काइलेट और पेट्रोल के कुछ अन्य घटकों के उत्पादन में कटौती करनी पड़ी।
हालांकि, कंपनी के मुनाफे पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का पूरा बोझ घरेलू ग्राहकों पर नहीं डाल पाने का असर पड़ा। कंपनी के अनुसार, रिफाइनरियों में रुकावट, रूसी निर्यात पर प्रतिबंध और चीन के निर्यात को लेकर अनिश्चितता के कारण आने वाले समय में भी वैश्विक ईंधन आपूर्ति सीमित रह सकती है।



