बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: निजी जमीन पर बने सरकारी स्कूल के बदले 90 दिन में देनी होगी वैकल्पिक भूमि

Bilaspur High Court News: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी जमीन पर सरकारी स्कूल के निर्माण से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य शासन को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की सहमति से उसकी इस्तेमाल की गई 0.15 एकड़ निजी जमीन के बराबर उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया 90 दिन के भीतर पूरी की जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पिता की कथित सहमति के आधार पर उसकी निजी जमीन का इस्तेमाल वैध नहीं माना जा सकता। यह मामला बिलासपुर जिले के मस्तूरी तहसील का है, जहां सरकारी स्कूल के शेड, रसोईघर और शौचालय का निर्माण निजी जमीन के एक हिस्से पर किया गया था।
निजी जमीन पर बना दिया सरकारी स्कूल का शेड, रसोईघर और शौचालय
यह पूरा मामला बिलासपुर जिले की मस्तूरी तहसील के निवासी आशीष अवस्थी से जुड़ा है। आशीष अवस्थी खसरा नंबर 66/14 की कुल 85 डिसमिल जमीन के दर्ज भूमिस्वामी हैं। यह जमीन 21 जनवरी 2021 को उनके नाम दर्ज हुई थी।
उनकी निजी जमीन के पास ही सरकारी भूमि पर बालक प्राथमिक शाला संचालित है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों और कर्मचारियों की सुविधा के लिए परिसर में शेड, रसोईघर और शौचालय का निर्माण कराया गया था। इन निर्माण कार्यों के दौरान आशीष अवस्थी की निजी जमीन का करीब 0.15 एकड़ हिस्सा भी इस्तेमाल कर लिया गया।
जब उन्हें अपनी जमीन के हिस्से पर हुए निर्माण की जानकारी हुई, तो उन्होंने प्रशासन के सामने जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग रखी। हालांकि, स्कूल के संचालन और विद्यार्थियों की सुविधा को देखते हुए उन्होंने जमीन खाली कराने के बजाय उसके बदले समान क्षेत्रफल की वैकल्पिक सरकारी जमीन देने का विकल्प भी मांगा।
तहसीलदार ने दिया था जमीन का कब्जा लौटाने का आदेश
आशीष अवस्थी ने अपनी निजी जमीन पर हुए निर्माण को लेकर तहसीलदार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। मामले पर सुनवाई के बाद तहसीलदार ने 29 दिसंबर 2022 को जमीन का कब्जा वापस लौटाने का आदेश जारी किया।
इसके बाद आशीष ने स्कूल के विद्यार्थियों और कर्मचारियों को होने वाली संभावित परेशानी को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक जमीन देने की मांग की। उनका कहना था कि जिस हिस्से का इस्तेमाल स्कूल के निर्माण में किया गया है, उसके बराबर दूसरी उपयुक्त सरकारी भूमि उन्हें उपलब्ध कराई जाए।
इस तरह मामला केवल जमीन का कब्जा वापस दिलाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि निजी भूमि के इस्तेमाल के बदले वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराने की मांग तक पहुंच गया।
अतिरिक्त कलेक्टर ने खारिज कर दिया था आवेदन
आशीष अवस्थी की वैकल्पिक जमीन देने की मांग को अतिरिक्त कलेक्टर ने 27 नवंबर 2024 को खारिज कर दिया था। आवेदन खारिज करने के पीछे यह तर्क दिया गया कि उनके पिता दुर्गा सहाय अवस्थी वर्ष 2005 से 2010 तक गांव के सरपंच रहे थे। उस दौरान स्कूल निर्माण को लेकर उनकी ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
प्रशासन के इस फैसले से असंतुष्ट होकर आशीष अवस्थी ने बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अतिरिक्त कलेक्टर के आदेश को चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने अदालत से निजी जमीन के इस्तेमाल के बदले उचित वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने की मांग की।
पिता की कथित सहमति से निजी जमीन का इस्तेमाल वैध नहीं: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पिता की कथित सहमति के आधार पर उसकी निजी संपत्ति का इस्तेमाल वैध नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने कहा कि निजी जमीन का इस्तेमाल करने के लिए जमीन के मालिक की वैध सहमति या इससे संबंधित कानूनी प्रमाण जरूरी हैं। केवल इस आधार पर कि जमीन मालिक के पिता ने अपने कार्यकाल के दौरान स्कूल निर्माण पर आपत्ति नहीं जताई थी, निजी भूमि के उपयोग को उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
90 दिन के भीतर वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की सहमति से इस्तेमाल की गई 0.15 एकड़ जमीन के बराबर उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के लिए जरूरी आदेश पारित किए जाएं।
अदालत ने इसके लिए आदेश की प्रति प्राप्त होने के 90 दिन के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। यानी संबंधित अधिकारियों को निर्धारित समयसीमा में वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराने के संबंध में आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।
कोर्ट ने इस निर्देश के साथ याचिका का निराकरण कर दिया।
निजी संपत्ति के अधिकार को लेकर क्या है इस फैसले का महत्व?
इस मामले में हाईकोर्ट ने निजी संपत्ति के अधिकार और सरकारी निर्माण के लिए जमीन के इस्तेमाल से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया है। अदालत के फैसले के मुताबिक, किसी व्यक्ति की निजी जमीन का उपयोग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसके परिवार के किसी सदस्य ने पहले आपत्ति नहीं जताई थी।
जमीन के इस्तेमाल के लिए वैध सहमति और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इस मामले में अदालत ने स्कूल की सुविधा और याचिकाकर्ता के संपत्ति अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
अब संबंधित अधिकारियों को हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार 90 दिन के भीतर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस फैसले से सरकारी निर्माण के लिए इस्तेमाल की गई निजी जमीन और उसके बदले मुआवजे या वैकल्पिक भूमि की मांग से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आया है।



