एथेनॉल का ‘कॉकटेल’ बना वाहनों का ‘साइलेंट किलर’

एथेनॉल का ‘कॉकटेल’ बना वाहनों का ‘साइलेंट किलर’ यह एक लाइन हर किसी को सोचने पर मजबूर कर सकती है। दरअसल देश में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। आम आदमी सोच रहा था कि सरकार कोई राहत देगी, लेकिन राहत के नाम पर जो मिला, उसने देश के करोड़ों वाहन मालिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। आपकी गाड़ी की टंकी में जो ईंधन डाला जा रहा है, वह शुद्ध पेट्रोल नहीं, बल्कि 20 से 30 फीसदी एथेनॉल का ‘कॉकटेल’ है। जो महंगी से महंगी गाड़ियों के लिए ‘साइलेंट किलर’ साबित हो रहा है।
एक तरफ सरकार इसे ‘ग्रीन फ्यूल’ और ‘मास्टरस्ट्रोक’ बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के ऑटोमोबाइल गैराजों से जो चीखें सुनाई दे रही हैं, वे डराने वाली हैं। मैकेनिकों का कहना है कि यह एथेनॉल गाड़ियों के लिए ‘साइलेंट किलर’ साबित हो रहा है। सवाल यह है कि जो आम जनता दोपहिया वाहनों के लिए अपनी गाढ़ी कमाई फूंक रही है और चार पहिया गाड़ी के शौक में लाखों का कर्ज सिर पर लादे बैठी है, क्या उसकी गाड़ी अपनी वास्तविक लाइफ का आधा रास्ता भी तय कर पाएगी?
क्या है एथेनॉल का केमिकल लोचा? इंजन की ‘किडनी’ फेल कर रहा है यह ईंधन!
सरकार जिस एथेनॉल (गन्ने और अनाज से बनने वाला अल्कोहल) को प्रमोट कर रही है, उसकी केमिकल प्रॉपर्टीज सामान्य पेट्रोल से बिल्कुल अलग होती हैं। विज्ञान कहता है कि एथेनॉल ‘हाइग्रोस्कोपिक’ (Hydroscopic) होता है, यानी यह हवा से नमी (पानी) को बहुत तेजी से सोखता है।
जब यह एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल आपकी गाड़ी की टंकी में जाता है, तो यह कुछ ही दिनों में नमी सोखकर टैंक के नीचे पानी की एक परत बना लेता है। इसे तकनीकी भाषा में ‘फेज सेपरेशन’ (Phase Separation) कहते हैं।
गाड़ियों पर होने वाले 5 जानलेवा असर:
- इंजन के अंदर जंग (Corrosion): पानी और अल्कोहल का यह मिश्रण गाड़ी के फ्यूल टैंक, फ्यूल पंप और इंजेक्टर्स में जंग लगा देता है।
- रबड़ और प्लास्टिक का गलना: पुरानी गाड़ियों (विशेषकर BS4 और उससे पहले की) के फ्यूल पाइप और रबर गास्केट इस एथेनॉल को बर्दाश्त नहीं कर पाते और गलने लगते हैं।
- फ्यूल पंप का अचानक फेल होना: आज हर दूसरी गाड़ी का फ्यूल पंप जाम हो रहा है। मैकेनिकों के पास ऐसी गाड़ियों की कतारें लगी हैं, जिनके इंजेक्टर्स चोक हो चुके हैं।
- माइलेज में भारी गिरावट: एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) पेट्रोल से लगभग 30% कम होती है। नतीजा? गाड़ी का माइलेज 10 से 15 फीसदी तक गिर जाता है। यानी पैसे पूरे पेट्रोल के और एवरेज कबाड़!
- पिकअप खत्म और स्टार्टिंग प्रॉब्लम: सुबह-सुबह गाड़ी स्टार्ट न होना और अचानक चलते-चलते झटका मारना अब आम बात हो चुकी है।
आम जनता जिसने लोन लेकर कार खरीदी है, वह अभी बैंक की किस्तें ही भर रही है कि तब तक गाड़ी के इंजन के पार्ट्स बदलने का लाखों का एक्स्ट्रा खर्च उसके सिर पर आ गिरता है।
गडकरी और पुरी के दावे बनाम ग्राउंड रियलिटी
इस पूरे संकट पर जब देश के केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी से सवाल किया जाता है, तो उनके जवाब हैरान करने वाले होते हैं। दोनों मंत्रियों का साफ कहना है कि:
“एथेनॉल से वाहनों को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हो रहा है। यह पर्यावरण के लिए वरदान है और इससे देश का पैसा बच रहा है।”
लेकिन हुजूर, सच क्या है?
सरकार के दावे केवल उन गाड़ियों के लिए सही हो सकते हैं जो BS6 Phase-2 (E20 Compliant) हैं, जिन्हें विशेष रूप से एथेनॉल झेलने के लिए अपग्रेड किया गया है। लेकिन उन करोड़ों गाड़ियों का क्या जो 2023 से पहले बनी थीं? देश की सड़कों पर दौड़ने वाली 80% गाड़ियां E20 ईंधन के लिए नहीं बनी हैं। मंत्रियों के बयान इस कड़वी हकीकत पर पर्दा डालने जैसे हैं।
आखिर सरकार की मंशा क्या है?
जब जनता त्रस्त है, गाड़ियां खराब हो रही हैं, तो सरकार एथेनॉल पर इतनी आक्रामक क्यों है? इसके पीछे की ‘क्रोनोलॉजी’ और अर्थशास्त्र को समझना बेहद जरूरी है:
- विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स रिजर्व) की बचत : भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने से सरकार का अरबों डॉलर का विदेशी कर्ज बचता है। सरकार का पूरा ध्यान देश के वित्तीय घाटे को कम करने पर है, भले ही इसके लिए आम जनता की गाड़ियों की बलि चढ़ानी पड़े।
- चीनी मिल लॉबी और कॉरपोरेट को फायदा : एथेनॉल का सबसे बड़ा स्रोत गन्ना है। देश में एक बहुत बड़ी और रसूखदार ‘शुगर मिल लॉबी’ (Sugar Mill Lobby) है। एथेनॉल ब्लेंडिंग से इन मिल मालिकों और बड़े कॉरपोरेट्स को सीधे तौर पर बंपर मुनाफा हो रहा है। सरकार किसानों के फायदे की बात कहती है, लेकिन असली मलाई मिल मालिक काट रहे हैं।
- ऑटोमोबाइल कंपनियों की चांदी (स्क्रैपिंग पॉलिसी को पुश) : पुरानी गाड़ियां जितनी जल्दी खराब होंगी, लोग उतनी ही जल्दी नई गाड़ियां खरीदेंगे। सरकार की ‘व्हीकल स्क्रैपिंग पॉलिसी’ और एथेनॉल का यह खेल सीधे तौर पर ऑटो सेक्टर को फायदा पहुंचा रहा है। यानी आपकी जेब कटेगी, तभी तो कॉरपोरेट घरानों के टर्नओवर बढ़ेंगे!
‘शौक में उठाया कर्ज, अब चुका रहे हैं हर्जाना’
- मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास परिवार के लिए बाइक या कार सिर्फ एक साधन नहीं, बल्कि उसका सपना होती है।
- एक डिलीवरी बॉय जो दिन भर में 100 किमी बाइक चलाता है, उसकी बाइक का कार्बोरेटर और फ्यूल कॉक 6 महीने में गल रहा है।
- एक नौकरीपेशा व्यक्ति जिसने ₹10 लाख का लोन लेकर कार खरीदी, वह हर सर्विसिंग में ₹15,000 से ₹20,000 का एक्स्ट्रा बिल सिर्फ फ्यूल सिस्टम की खराबी के कारण भर रहा है।
जनता का सीधा सवाल है: यदि पेट्रोल में 20 से 30 फीसदी एथेनॉल मिलाया जा रहा है, जिसकी लागत शुद्ध पेट्रोल से बहुत कम है, तो पेट्रोल की कीमतें कम क्यों नहीं हो रही हैं? एथेनॉल की मिलावट का फायदा सीधे सरकार की तिजोरी और तेल कंपनियों को मिल रहा है, जबकि नुकसान और मरम्मत का पूरा खर्च देश की भोली-भाली जनता उठा रही है।
क्या है इस ‘एथेनॉल बम’ से बचने का रास्ता?
सरकार अपनी नीति बदलने से रही, क्योंकि उसका लक्ष्य 2025-26 तक पूरे देश में E20 (20% एथेनॉल) को पूरी तरह लागू करना है। ऐसे में अपनी गाड़ी को कबाड़ होने से बचाने के लिए आपको खुद ही सावधानी बरतनी होगी:
- फ्यूल एडिटिव्स का इस्तेमाल करें: बाजार में एथेनॉल प्रोटेक्शन वाले फ्यूल एडिटिव्स (Additives) मिलते हैं, जो फेज सेपरेशन को रोकते हैं। इन्हें हर 2-3 रीफ्यूलिंग के बाद टंकी में डालें।
- गाड़ी को लंबे समय तक खड़ी न रखें: अगर गाड़ी हफ्तों खड़ी रहेगी, तो टैंक में पानी जमा हो जाएगा। टैंक को हमेशा फुल रखने की कोशिश करें ताकि हवा (और नमी) के लिए जगह न बचे।
- विश्वसनीय पेट्रोल पंप से ही ईंधन लें: जहां टर्नओवर ज्यादा हो, वहीं से पेट्रोल लें ताकि पुराना और नमी सोखा हुआ ईंधन आपकी गाड़ी में न आए।
आखिरी कड़वा सच: एथेनॉल क्रांति के नाम पर आम आदमी की गाड़ी की बलि दी जा रही है। नीतियां एयर-कंडीशनर कमरों में बनती हैं, लेकिन भुगतना सड़क पर चलने वाले को पड़ता है। गडकरी जी और पुरी जी के दावे अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन देश के गैराजों में खड़ी गाड़ियां चिल्ला-चिल्ला कर कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं!

