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ईसाई हैं थलपति विजय, फिर भी मंदिर की परंपरा का रखा मान; हाईकोर्ट ने की तारीफ

चेन्नई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और अभिनेता थलपति विजय (Vijay) धार्मिक आस्था और मंदिरों की परंपराओं से जुड़े एक मामले को लेकर चर्चा में हैं। मद्रास हाईकोर्ट में हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान विजय के आचरण का उल्लेख किया गया। अदालत ने उनके मीनाक्षी अम्मन मंदिर में दर्शन करने के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया को धार्मिक परंपराओं के सम्मान का उदाहरण बताया।

मामला तमिलनाडु के आगमिक परंपरा वाले मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी दूसरे धर्म से संबंध रखने वाले व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश के लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं है। हालांकि, संबंधित मंदिर की परंपराओं और आराध्य देवी-देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की शर्त लागू हो सकती है। अदालत की टिप्पणी ने धार्मिक आस्था, मंदिरों की परंपराओं और विभिन्न धर्मों के बीच सामंजस्य से जुड़ी बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।

मंदिर में दर्शन से पहले विजय ने भरा था घोषणा-पत्र

मामले की सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री विजय (Vijay) की 28 सितंबर 2026 को हुई मदुरै यात्रा का उल्लेख किया गया। इस दौरान उन्होंने प्रसिद्ध मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर में दर्शन किए थे। मंदिर पहुंचने पर उनका पारंपरिक पूर्ण कुंभ सम्मान के साथ स्वागत किया गया था।

मंदिर में प्रवेश से पहले विजय ने प्रशासन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए एक लिखित घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें उन्होंने मंदिर की आराध्य देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने की सहमति दी थी। इसके बाद उन्होंने देवी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर के दर्शन कर पूजा-अर्चना की।

अदालत ने इस उदाहरण के जरिए बताया कि किसी दूसरे धर्म से जुड़े व्यक्ति के लिए मंदिर की परंपराओं का सम्मान करना और धर्म परिवर्तन करना दो अलग-अलग बातें हैं। विजय के मामले में मंदिर की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था, न कि उन्हें धर्म बदलने के लिए कहा गया था।

हाईकोर्ट बोला- धर्म बदलना जरूरी नहीं, परंपराओं का सम्मान जरूरी

न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की पीठ ने आगमिक परंपरा वाले मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश से संबंधित नियमों पर विचार किया। अदालत के सामने सवाल था कि ऐसे मंदिरों में प्रवेश करने वाले गैर-हिंदू श्रद्धालुओं के लिए किन शर्तों का पालन जरूरी किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि संबंधित मंदिर की धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने की शर्त को धर्म परिवर्तन की अनिवार्यता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अलग-अलग धर्मों के लोग अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखते हुए भी दूसरे धर्मों की आस्था और परंपराओं के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकते हैं।

विजय के मंदिर दर्शन का उदाहरण इसी संदर्भ में सामने आया। उन्होंने मंदिर प्रशासन की निर्धारित प्रक्रिया पूरी की और देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। अदालत की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह था कि धार्मिक परंपराओं के पालन और किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आगमिक मंदिरों में प्रवेश के लिए घोषणा-पत्र की शर्त

मामले में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने आगमिक परंपरा वाले मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर दिशानिर्देश दिए। इसके अनुसार, ऐसे मंदिरों में प्रवेश करने वाले गैर-हिंदू व्यक्तियों से संबंधित देवी-देवता के प्रति श्रद्धा और मंदिर की धार्मिक परंपराओं का पालन करने की सहमति वाला लिखित घोषणा-पत्र लिया जा सकता है।

घोषणा-पत्र का प्रारूप संबंधित मंदिर प्रशासन तय करेगा। निर्धारित घोषणा देने से इनकार करने वाले व्यक्ति को ऐसे आगमिक मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं दिए जाने की बात भी आदेश में कही गई है।

हालांकि, इस निर्देश का दायरा समझना जरूरी है। इसे सभी धर्मों के पूजा स्थलों या देश के प्रत्येक मंदिर में प्रवेश पर लागू होने वाला सामान्य प्रतिबंध नहीं माना जाना चाहिए। यह मामला विशेष रूप से आगमिक परंपरा से संचालित हिंदू मंदिरों की धार्मिक व्यवस्था से संबंधित है।

क्या होते हैं आगमिक मंदिर?

आगमिक मंदिर वे हिंदू मंदिर हैं, जहां पूजा-पद्धति, धार्मिक अनुष्ठान और मंदिर की व्यवस्था आगम शास्त्रों में वर्णित परंपराओं के अनुसार संचालित होती है। इनमें पूजा करने, गर्भगृह तक पहुंचने और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष नियम हो सकते हैं।

तमिलनाडु के कई प्राचीन मंदिर आगमिक परंपराओं का पालन करते हैं। इन मंदिरों की धार्मिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों को लेकर नियमों का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है। अदालत के सामने भी इसी विशिष्ट व्यवस्था के तहत गैर-हिंदुओं के प्रवेश का प्रश्न था।

पीठ ने भगवान अयप्पा और शिरडी साईं बाबा के पूजा स्थलों का उदाहरण देते हुए अलग-अलग धार्मिक स्थलों की परंपराओं में अंतर की ओर ध्यान दिलाया। इन स्थानों पर विभिन्न धर्मों के श्रद्धालु आते हैं। इसलिए आगमिक मंदिरों के संदर्भ में दिए गए निर्देशों को हर धार्मिक स्थल पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

जनहित याचिका से शुरू हुआ मामला

यह मामला मदुरै निवासी के. थंगम वेंकटेश की जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर मौजूदा नियमों का सख्ती से पालन कराने की मांग की थी। याचिका में मंदिर के मंडपम और कोडीमरम यानी ध्वज स्तंभ से आगे प्रवेश करने से संबंधित नियमों का भी उल्लेख किया गया था।

सुनवाई के दौरान मंदिरों की धार्मिक परंपराओं और श्रद्धालुओं के प्रवेश से जुड़े सवालों पर विचार हुआ। मुख्यमंत्री विजय (Vijay) के मंदिर दर्शन का उदाहरण इसी बहस के बीच सामने आया।

इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि धार्मिक स्थलों की परंपराओं का सम्मान सुनिश्चित करते हुए विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच सामंजस्य कैसे बनाए रखा जाए। अदालत की टिप्पणी में मंदिर की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने और धर्म परिवर्तन को अलग-अलग विषयों के रूप में देखने पर जोर दिया गया।

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