अमेरिका के प्रस्तावित 100% टैरिफ बिल से भारत की बढ़ी चिंता, रूस से तेल, रक्षा सौदों और निर्यात पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली। रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए प्रस्तावित 100% टैरिफ बिल ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो रूस के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने वाले देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका सबसे अधिक असर भारत के रूस से तेल आयात, रुपया-रूबल भुगतान प्रणाली, रक्षा सौदों और अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ने की आशंका है।
हालांकि यह विधेयक अभी कानून नहीं बना है। इसे लागू होने से पहले अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बावजूद इस प्रस्ताव ने भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
डॉलर के विकल्प पर अमेरिका की सख्ती
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रूस, भारत, चीन और ब्रिक्स के कई देशों ने आपसी व्यापार में अमेरिकी डॉलर की बजाय स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा दिया। अमेरिका इसे डॉलर की वैश्विक भूमिका के लिए चुनौती मानता है और ऐसे देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
भारत के लिए तीन बड़ी चुनौतियां
1. रूस से सस्ता कच्चा तेल
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। वर्तमान में भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 35 से 40 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आयात करता है। यदि अमेरिका सख्त कदम उठाता है, तो यह आयात महंगा पड़ सकता है।
2. रुपया-रूबल भुगतान व्यवस्था
रूस को SWIFT भुगतान प्रणाली से बाहर किए जाने के बाद भारत और रूस ने वोस्ट्रो अकाउंट के माध्यम से रुपये और रूबल में भुगतान की व्यवस्था विकसित की। प्रस्तावित अमेरिकी विधेयक ऐसे गैर-डॉलर भुगतान तंत्रों को भी निशाना बनाता है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार प्रभावित हो सकता है।
3. रक्षा सौदों पर असर
भारत के सैन्य उपकरणों का बड़ा हिस्सा रूसी मूल का है। एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम समेत कई बड़े रक्षा समझौते रूस के साथ हैं। प्रतिबंध लागू होने की स्थिति में भुगतान, रखरखाव और भविष्य के रक्षा सौदों में कठिनाइयां आ सकती हैं।
अमेरिका को निर्यात भी हो सकता है प्रभावित
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 120-130 अरब डॉलर का है, जबकि भारत को लगभग 34.41 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) प्राप्त है। यदि भारतीय उत्पादों पर 100% टैरिफ लगाया जाता है, तो आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और रत्न-आभूषण जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को बड़ा झटका लग सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे होने से उनकी मांग घटने की आशंका रहेगी।
रणनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की भी परीक्षा है। पहले भी अमेरिका ने रूस से रक्षा खरीद को लेकर CAATSA कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी, लेकिन भारत के रणनीतिक महत्व को देखते हुए कठोर कदम नहीं उठाए गए। इस बार मामला डॉलर के विकल्प के रूप में स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़ा है, इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इसके कानून बनने में अभी कई प्रक्रियाएं बाकी हैं। हालांकि, इसने भारत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि वह रूस के साथ अपने आर्थिक संबंधों और अमेरिका के साथ व्यापारिक हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखेगा।

