इजराइल-सऊदी समझौते की कोशिश में जुटे थे लिंडसे ग्राहम, मौत से पहले बनाई थी बड़ी कूटनीतिक रणनीति

वॉशिंगटन। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम अपनी मौत से कुछ सप्ताह पहले इजराइल और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक संबंध सामान्यीकरण (नॉर्मलाइजेशन) समझौते की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी योजना ट्रंप प्रशासन, सऊदी नेतृत्व और इजराइल के साथ मिलकर मध्य-पूर्व में नई कूटनीतिक पहल शुरू करने की थी।
रिपोर्ट के अनुसार, रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता और इजराइल के प्रबल समर्थक ग्राहम लंबे समय से दोनों देशों के रिश्ते सामान्य कराने की कोशिश कर रहे थे। उनका मानना था कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की कार्रवाई के बाद ऐसा समझौता कराने का अनुकूल माहौल बन सकता है।
अक्टूबर चुनावों के बाद शुरू करना चाहते थे पहल
बताया गया है कि ग्राहम चाहते थे कि इजराइल और अमेरिका में होने वाले चुनावों के बाद नई कूटनीतिक पहल शुरू की जाए, ताकि जनवरी में नई अमेरिकी कांग्रेस के गठन से पहले समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके।
होर्मुज स्ट्रेट पर सैन्य कार्रवाई का भी दिया था सुझाव
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहम ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से यह भी आग्रह किया था कि यदि कूटनीतिक प्रयास विफल हों, तो होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए सीमित लेकिन प्रभावी सैन्य अभियान चलाने पर विचार किया जाए।
मई से चल रही थी रणनीति पर चर्चा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहम ने मई में ट्रंप के साथ इस योजना पर चर्चा शुरू की थी। इसके बाद ट्रंप ने अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से इजराइल के साथ संबंध सामान्य बनाने की अपील भी की थी, बशर्ते ईरान के साथ विवाद का समाधान निकल सके।
सऊदी और इजराइली नेताओं से भी की थी बातचीत
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल के सप्ताहों में ग्राहम ने ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकारों, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के करीबी सहयोगियों, वॉशिंगटन में सऊदी राजदूत और सऊदी विदेश मंत्री के साथ भी इस पहल पर चर्चा की थी। अगस्त में उनके इजराइल और सऊदी अरब दौरे की भी योजना थी, ताकि समझौते की संभावनाओं का आकलन किया जा सके।
फिलिस्तीन मुद्दा अब भी सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि, सऊदी अरब लगातार यह कहता रहा है कि इजराइल के साथ किसी भी समझौते में फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप शामिल होना चाहिए। वहीं, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदा सरकार इस शर्त को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में भविष्य में इस तरह के किसी समझौते के लिए राजनीतिक सहमति सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

